उत्तर प्रदेश में
शिक्षामित्रों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपना फैसला सुना दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा मित्रों को राहत देते हुए कहा है कि शिक्षामित्र तत्काल नहीं हटाए जाएंगे।कोर्ट के अनुसार शिक्षामित्रों को शिक्षक भर्ती की
औपचारिक परीक्षा में बैठना होगा और उन्हें लगातार दो प्रयासों में यह परीक्षा पास करनी होगी।
यहां पढ़ें शिक्षामित्रों के मामले में कब क्या हुआ
26 मई, 1999 -सरकारी प्राइमरी स्कूलों में 11 महीने की संविदा पर बारहवीं पास शिक्षामित्रों को रखने की शुरुआत हुई।
4 अगस्त, 2009- शिक्षा का अधिकार कानून लागू। बुनियादी शिक्षा में अप्रशिक्षित शिक्षकों के पढ़ाने पर रोक।
2 जून, 2010- शिक्षामित्रों की नियुक्ति पर रोक लगी।
11 जुलाई, 2011- तत्कालीन बसपा सरकार ने प्रदेश में कार्यरत लगभग पौने दो लाख शिक्षामित्रों को दूरस्थ विधि से बीटीसी का दो वर्षीय प्रशिक्षण देने का फैसला किया।
19 जून, 2014 - तत्कालीन सपा सरकार ने पहले चरण में प्रशिक्षित 58 हजार शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर समायोजित करने का आदेश जारी किया
8 अप्रैल, 2015- दूसरे चरण में प्रशिक्षित लगभग 90 हजार शिक्षामित्रों के समायोजन के आदेश जारी
12 सितम्बर, 2015- हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों के समायोजन को अवैध ठहराते हुए इसे रद्द किया।
7 दिसम्बर, 2015 - सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई और बचे हुए शिक्षामित्रों के समायोजन पर भी रोक लगाई।
25 जुलाई, 2017 - सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द किया है। लेकिन शिक्षामित्र तत्काल नहीं हटाए जाएंगे। कोर्ट के अनुसार शिक्षामित्रों को शिक्षक भर्ती की औपचारिक परीक्षा में बैठना होगा और उन्हें लगातार दो प्रयासों में यह परीक्षा पास करनी होगी। शिक्षक भर्ती परीक्षा में शिक्षामित्रों को अध्यापन अनुभव का वेटेज तथा उम्र सीमा में रियायत दी जा सकती है।

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